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Essay On Indian Farmer In Hindi Language

भारतीय किसानों पर निबंध Short Essay On Indian Farmer In Hindi Language

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी है | देश की कुल श्रम-शक्ति का लगभग 51 प्रतिशत भाग कृषि एंव इससे संबंधित उद्योग-धंधों से अपनी आजीविका कमाता है | ब्रिटिश काल में भारतीय कृषक अंग्रेजों एवं जमींदारों के जुल्म से परेशान एंव बेहाल थे | स्वतन्त्रता के बाद उनकी स्थिति में काफी सुधार हुआ, किन्तु जिस तरह कृषकों के शहरों की ओर पलायन एवं उनकी आत्महत्या की खबरें सुनने को मिलती हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी स्थिति में आज भी अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है | स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि कृषक अपने बच्चों को आज कृषक नहीं बनाना चाहता |

भारतीय कृषक बहुत कठोर जीवन जीता है | अधिकतर भारतीय कृषक निरंतर घटते भू-क्षेत्र के कारण गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं | दिन-रात खेतों में परिश्रम करने के बाद भी उन्हें तन ढकने के लिए समुचित कपड़ा नसीब नहीं होता | जाड़ा हो या गर्मी, धूप हो या बरसात उन्हें दिन-रात बस खेतों में ही परिश्रम करना पड़ता है | इसके बावजूद भी उन्हें फसलों से उचित आय नहीं हो पाती | बड़े-बड़े व्यापारी कृषकों से सस्ते मूल्य पर ख़रीदे गए खाद्यान्न, सब्जी एंव फलों को बाजारों में ऊँची ड्रोन पर बेच देते हैं | इस तरह कृषकों का श्रम लाभ किसी और को मिल जाता है और किसान अपनी किस्मत को कोसता है |

किसानों की ऐसी दयनीय स्थिति का एक कारण यह भी है कि भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर है और मानसून की अनिश्चितता के कारण प्रायः कृषकों को कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | समय पर सिंचाई नहीं होने के कारण भी उन्हें आशानुरुप फसल की प्राप्ति नहीं हो पाती | ऊपर से आवश्यक उपयोगी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण कृषकों की स्थिति और भी दयनीय हो गई है तथा उनके सामने दो वक्त की रोटी की समस्या खड़ी हो गई है | कृषि में श्रमिकों की आवश्यकता साल भर नहीं होती, इसलिए साल के लगभग तीन-चार महीने कृषकों को खाली बैठना पड़ता है | इस कारण भी कृषको के गांव से शहरों की ओर पलायन में वृद्धि हुई है |

देश के विकास में कृषकों के योगदान को देखते हुए, कृषकों और कृषि-क्षेत्र के लिए कार्य योजना का सुझाव देने हेतु डॉ. एम.एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय कृषक आयोग’ का गठन किया गया था | इसने 2006 में अपनी चौथी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कृषकों के लिए एक विस्तृत नीति के निर्धारण की संस्तुति की गई | इसमें कहा गया कि सरकार को सभी कृषिगत उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना चाहिए तथा यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कृषकों को विशेषत: वर्षा आधारित कृषि वाले क्षेत्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य उचित समय पर प्राप्त हो सके |

राष्ट्रीय कृषक आयोग की संस्तुति पर भारत सरकार ने राष्ट्रीय कृषि नीति, 2007 की घोषणा की | इसमें कृषकों के कल्याण एवं कृषि के विकास के लिए कई बातों पर जोर दिया गया है | इसमें कही गई बातें इस प्रकार हैं- सभी कृषिगत उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाए | मूल्यों में उतार-चढ़ाव से कृषकों की सुरक्षा हेतु मार्केट रिस्क स्टेबलाइजेशन फण्ड की स्थापना की जाए | सूखे एंव वर्षा संबंधी जोखिमों से बचाव हेतु एग्रीकल्चर रिस्क फण्ड स्थापित किया जाए | सभी राज्यों में राज्यस्तरीय किसान आयोग का गठन किया जाए | कृषकों के लिए बीमा योजना का विस्तार किया जाए | कृषि संबंधी मामलों में स्थानीय पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की जाए | राज्य सरकारों द्वारा कृषि हेतु अधिक संस्थानों का आवंटन किया जाए |

प्रायः यह देखा जाता था कि कृषकों को फसलों, खेती के तरीकों एवं आधुनिक कृषि उपकरणों के संबंध में उचित जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण खेती से उन्हें अनुचित लाभ नहीं मिल पाता था | इसलिए कृषकों को कृषि संबंधी बातों की जानकारी उपलब्ध करवाने हेतु किसान कॉल सेंटर की शुरूआत 2004 में की गई | कृषक बिना कोई शुल्क दिए 1551 नंबर डायल करके कृषि संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं | इसके अतिरिक्त कृषि संबंधी कार्यक्रमों का प्रसारण करने वाले ‘कृषि चैनल’ की भी शुरुआत की गई है | केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण विकास बैंक के लिए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रूरल नॉलेज सेंटर की भी स्थापना की है | इन केन्द्रों में आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी व दूरसंचार तकनीक का उपयोग किसानों को वांछित जानकारियाँ उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है |

कृषकों को वर्ष के कई महीने खाली बैठना पड़ता है, क्योंकि साल भर उनके पास नहीं होता | इसलिए ग्रामीण लोगों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का शुभारंभ 2006 में किया गया | 2 अक्टूबर 2009 से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) का नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) कर दिया गया है | यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार के एक वयस्क सदस्य को वर्ष में कम से कम 100 दिन के ऐसे रोजगार की गारंटी देता है | इस अधिनियम में इस बात को भी सुनिश्चित किया गया है कि इसके अंतर्गत 33% लाभ महिलाओं को मिले |

इस योजना से पहले भी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को रोजगार प्रदान करने के लिए कई योजनाएं प्रारंभ की गई थीं, किन्तु उनमें भ्रष्टाचार के मामले अत्यधिक उजागर हुए | अतः इससे बचने के लिए रोजगार के इच्छुक व्यक्ति का रोजगार-कार्ड बनाने का प्रावधान किया गया है | ग्राम-पंचायत जो रोजगार-कार्ड जारी करती है, उस पर उसकी पूरी जानकारी के साथ-साथ उसकी फोटो भी लगी होती है | पंजीकरण कराने के 15 दिन के भीतर रोजगार न मिलने पर निर्धारित दर से सरकार द्वारा बेरोजगारी भत्ता प्रदान किया जाता है | रोजगार के इच्छुक व्यक्ति को रोजगार 5 किलोमीटर के दायरे के भीतर उपलब्ध कराया जाता है | यदि कार्य-स्थल 5 किलोमीटर के दायरे से बाहर हो, तो उसके बदले अतिरिक्त भत्ता देने का भी प्रावधान है | कानून द्वारा रोजगार की गारंटी मिलने के बाद न केवल ग्रामीण विकास को गति मिली है बल्कि ग्रामीणों का शहर की ओर पलायन भी कम हुआ है |

कृषकों को समय-समय पर धन की आवश्यकता पड़ती है | साहूकार से लिए गए ऋण पर उन्हें अत्यधिक ब्याज देना पड़ता है | कृषकों की इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, उन्हें साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए 1998 में ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ योजना की भी शुरुआत की गई | इस योजना के फलस्वरूप कृषकों के लिए वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा सहकारी बैंको से ऋण प्राप्त करना सरल हो गया है |

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है | इसलिए अर्थव्यवस्था में सुधार एंव देश की प्रगति के लिए किसानों की प्रगति आवश्यक है | केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा प्रारंभ की गई विभिन्न प्रकार की योजनाओं एवं नई कृषि नीति के फलस्वरुप कृषकों की स्थिति में सुधार हुआ है, किन्तु अभी तक इसमें संतोषजनक सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है | आशा है, विभिन्न प्रकार के सरकारी प्रयासों एवं योजनाओं के कारण, आने वाले वर्षों में कृषक समृद्धि होकर भारतीय अर्थव्यवस्था को सही अर्थों में प्रगति की राह पर अग्रसर कर सकेंगे |

Here is a compilation of Essays on ‘Indian Farmer ’ for Class 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on ‘Indian Farmer ’ especially written for Kids, School and College Students in Hindi Language.

List of Essays on Indian Farmer


Essay Contents:
  1.   भारतीय किसान । Essay on Indian Farmer in Hindi Language
  2. भारतीय कृषक (किसान) | Essay on Indian Farmer for Kids in Hindi Language
  3. भारतीय किसान । Essay on Indian Farmer for School Students in Hindi Language
  4. भारतीय किसान | Essay on Indian Farmer for College Students in Hindi Language
  5. भारतीय किसान | Essay on Indian Farmer for College Students in Hindi Language
  6. भारत में किसानों की स्थिति । Essay on the Status of Farmer in India for College Students in Hindi Language

1. भारतीय किसान ।Essay on Indian Farmer in Hindi Language

त्याग और तपस्या का दूसरा नाम है किसान । वह जीवन भर मिट्‌टी से सोना उत्पन्न करने की तपस्या करता रहता है । तपती धूप, कड़ाके की ठंड तथा मूसलाधार बारिश भी उसकी इस साधना को तोड़ नहीं पाते । हमारे देश की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गांवों में निवास करती है । जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है ।

एक कहावत है कि भारत की आत्मा किसान है जो गांवों में निवास करते हैं । किसान हमें खाद्यान्न देने के अलावा भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भी सहेज कर रखे हुए हैं । यही कारण है कि शहरों की अपेक्षा गांवों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता अधिक देखने को मिलती है । किसान की कृषि ही शक्ति है और यही उसकी भक्ति है ।

वर्तमान संदर्भ में हमारे देश में किसान आधुनिक विष्णु है । वह देशभर को अन्न, फल, साग, सब्जी आदि दे रहा है लेकिन बदले में उसे उसका पारिश्रमिक तक नहीं मिल पा रहा है । प्राचीन काल से लेकर अब तक किसान का जीवन अभावों में ही गुजरा है । किसान मेहनती होने के साथ-साथ सादा जीवन व्यतीत करने वाला होता है ।

समय अभाव के कारण उसकी आवश्यकतायें भी बहुत सीमित होती हैं । उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता पानी है । यदि समय पर वर्षा नहीं होती है तो किसान उदास हो जाता है । इनकी दिनचर्या रोजाना एक सी ही रहती है । किसान ब्रह्ममुहूर्त में सजग प्रहरी की भांति जग उठता है । वह घर में नहीं सोकर वहां सोता है जहां उसका पशुधन होता है ।

उठते ही पशुधन की सेवा, इसके पश्चात अपनी कर्मभूमि खेत की ओर उसके पैर खुद-ब-खुद उठ जाते हैं । उसका स्नान, भोजन तथा विश्राम आदि जो कुछ भी होता है वह एकान्त वनस्थली में होता है । वह दिनभर कठोर परिश्रम करता है । स्नान भोजन आदि अक्सर वह खेतों पर ही करता है । सांझ ढलते समय वह कंधे पर हल रख बैलों को हांकता हुआ घर लौटता है ।

कर्मभूमि में काम करने के दौरान किसान चिलचिलाती धूप के दौरान तनिक भी विचलित नहीं होता । इसी तरह मूसलाधार बारिश या फिर कड़ाके की ठंड की परवाह किये बगैर किसान अपने कृषि कार्य में जुटा रहता है । किसान के जीवन में विश्राम के लिए कोई जगह नहीं है ।

वह निरंतर अपने कार्य में लगा रहता है । कैसी भी बाधा उसे अपने कर्तव्यों से डिगा नहीं सकती । अभाव का जीवन व्यतीत करने के बावजूद वह संतोषी प्रवृत्ति का होता है । इतना सब कुछ करने के बाद भी वह अपने जीवन की आवश्यकतायें पूरी नहीं कर पाता । अभाव में उत्पन्न होने वाला किसान अभाव में जीता है और अभाव में इस संसार से विदा ले लेता है ।

अशिक्षा, अंधविश्वास तथा समाज में व्याप्त कुरीतियां उसके साथी हैं । सरकारी कर्मचारी, बड़े जमीदार, बिचौलिया तथा व्यापारी उसके दुश्मन हैं, जो जीवन भर उसका शोषण करते रहते हैं । आज से पैंतीस वर्ष पहले के किसान और आज के किसान में बहुत अंतर आया है । स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात किसान के चेहरे पर कुछ खुशी देखने को मिली है ।

अब कभी-कभी उसके मलिन-मुख पर भी ताजगी दिखाई देने लगती है । जमीदारों के शोषण से तो उसे मुक्ति मिल ही चुकी है परन्तु वह आज भी पूर्ण रूप से सुखी नहीं है । आज भी 20 या 25 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिनके पास दो समय का भोजन नहीं है । शरीर ढकने के लिए कपड़े नहीं हैं । टूटे-फूटे मकान और टूटी हुई झोपड़ियाँ आज भी उनके महल बने हुए हैं ।

हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से किसान के जीवन में कुछ खुशियां लौटी हैं । सरकार ने ही किसानों की ओर ध्यान देना शुरू किया है । उनके अभावों को कम करने के प्रयास में कई योजनाएं सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं । किसानों को समय-समय पर गांवों में ही कार्यशाला आयोजित कर कृषि विशेषज्ञों द्वारा कृषि क्षेत्र में हुए नये अनुसंधानों की जानकारी दी जा रही है ।

इसके अलावा उन्हें रियायती दर पर उच्च स्तर के बीज, आधुनिक कृषि यंत्र, खाद आदि उपलब्ध कराये जा रहे हैं । उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने व व्यवसायिक खेती करने के लिए सरकार की ओर से बहुत कम ब्याज दर पर ऋण मुहैया कराया जा रहा है ।

खेतों में सिंचाई के लिए नहरों व नलकूपों का निर्माण कराया जा रहा है । उन्हें शिक्षित करने के लिए गांवों में रात्रिकालीन स्कूल खोले जा रहे हैं । इन सब कारणों के चलते किसान के जीवन स्तर में काफी सुधार आया है । उसकी आर्थिक स्थिति भी काफी हद तक सुदृढ़ हुई है ।


2. भारतीय कृषक (किसान) |Essay on Indian Farmer for Kids in Hindi Language

भारत एक कृषि प्रधान देश है । हमारी सम्पन्नता हमारे कृषि उत्पादन पर निर्भर करती है । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भारतीय कृषक की एक बड़ी भूमिका है । वास्तव में भारत कृषकों की भूमि है । हमारी 75% जनता गांवों में रहती है ।

भारतीय किसान का सर्वत्र सम्मान होता है । वह ही सम्पूर्ण भारतवासियों के लिए अन्न एवं सब्जियाँ उत्पन्न करता है । पूरा वर्ष भारतीय कृषक खेत जोतने बीज बोने एव फसल उगाने में व्यस्त रहता है । वास्तव में उसका जीवन अत्यन्त व्यस्त होता है ।

वह प्रात: तड़के उठता है और अपने हल एव बैल लेकर खेतों की ओर चला जाता है । वह घन्टों खेत जोतता है । तत्पश्चात नाश्ता करता है । उसके घर-परिवार के सदस्य उसके लिये खेत में खाना लाते हैं । उसका खाना बहुत साधारण होता है ।

इसमें अधिकतर चपाती (रोटी) अचार एवं लस्सी (छाछ) होती है । खाने के पश्चात् पुन: वह अपने काम में व्यस्त हो जाता है । वह कठिन परिश्रम करता है । किन्तु कठिन परिश्रम के पश्चात भी उसे बहुत कम लाभ होता है । वह अपनी उपज को बाजार में बहुत कम दामों पर बेचता है ।

कृषक बहुत सादा जीवन जीता है । उसका पहनावा ग्रामीण होता है । वह फूस के झोपड़ी में रहता है हालांकि पँजाब हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के बहुत से कृषकों के पक्के मकान भी हैं । उसकी सम्पत्ति कुछ बैल हल एवं कुछ एकड़ धरती ही होती है । वह अधिकतर अभावों का जीवन जीता है ।

एक कृषक राष्ट्र की आत्मा होता है । हमारे दिवंगत राष्ट्रपति श्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था ‘जय किसान जय जवान’ । उन्होंने कहा था कि कृषक राष्ट्र का अन्नदाता है । उसी पर कृषि उत्पादन निर्भर करता है । उन्हें कृषि के सभी आधुनिकतम यंत्र एव उपयोगी रसायन उपलब्ध कराने चाहिये ताकि वह अधिक उत्पादन कर सके ।


3. भारतीय किसान । Essay on Indian Farmer for School Students in Hindi Language

1. प्रस्तावना ।

2. भारतीय किसान की एवं उसका महत्त्व ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

भारत एक कृषि प्रधान देश है । यहां की अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि ही है । कृषि कर्म ही जिनके जीवन का आधार हो, वह है कृषक । कृषि प्रधान देश होने के कारण हमारे देश की अर्थव्यवस्था का लगभग समूचा भार भारतीय किसान के कन्धों पर ही है ।

चूंकि हमारे देश की अधिकांश जनता गांवों में निवास करती है, अत: भारतीय किसान ग्रामीण वातावरण में ही रहकर विषमताओं से जूझते हुए अपने कर्म में नि:स्वार्थ भाव से लगा रहता है । इस अर्थ में भारतीय किसान का समूचा जीवन उसके अपूर्व त्याग, तपस्या, परिश्रम, ईमानदारी, लगन व कर्तव्यनिष्ठा की अद्‌भुत मिसाल है ।

जीवन की तमाम विसंगतियों, विपन्नताओं एवं अभावों से जूझते हुए, सृष्टि के जीवों की क्षुधा को शान्त करता है । अपने मेहनतकश हाथों से अन्न के दानों और रोटी को तैयार करने वाला भारतीय किसान अपने कर्म में निरन्तर गतिशील रहता है ।

2. भारतीय किसान की स्थिति एवं महत्त्व:

भारतीय किसान धरती माता का सच्चा सपूत है । वह ऋषि-मुनियों, सन्त-महात्माओं के जीवन के उच्चादर्शो के काफी निकट है; क्योंकि वह भीषण गरमी में गम्भीर आघातों को सहकर, कड़ाके की ठण्ड में और बरसते हुए पानी में रहकर अपने कर्म में बड़ी ही ईमानदारी एवं तत्परता से लगा रहता है ।

धरती के समूचे प्राणियों के जीवन के लिए अन्न उपजाने वाला भारतीय किसान इतना परोपकारी एवं मेहनती है कि वह अपने स्वार्थ व सुख की तनिक भी चिन्ता नहीं करता । उसका जीवन अत्यन्त सीधा-सादा है । शरीर पर धोती, अंगरखा, गमछा और नंगे पैर रहकर भी दूसरों के लिए अन्न उपजाना ही उसका ध्येय है ।

प्रात: काल सूरज के उगने के साथ सायंकाल सूरज के डूबने तक खेतों में काम करना ही उसके जीवन की साधना है । घर पर अपने पशुओं की सेवा करने में भी वह जरा सी भी सुस्ती नहीं करता । जहां तक भारतीय किसान की स्थिति है, वह अत्यन्त दयनीय है । 50 प्रतिशत से अधिक भारतीय किसान जमींदारों, पूंजीपतियों, साहूकारों के आर्थिक शोषण का शिकार है ।

ऋणग्रस्तता ने उन्हें गरीबी के मुंह में धकेल दिया है । जमींदारों के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ उसका जीवन कभी अकाल, तो कभी महामारी तो कभी बाढ़ या सूखे की चपेट में आ जाता है । ऐसी स्थिति में उसे असमय ही मृत्यु वरण करने को विवश होना पड़ता है । कई बार तो उन्हें सपरिवार सामूहिक रूप में भीषण गरीबी से जूझते हुए आत्महत्या भी करनी पड़ जाती है ।

कर्ज के बोझ तले दबा उसका जीवन किसी बंधुआ मजूदर के जीवन से कुछ कम नहीं होता । सच कहा जाये, तो वह कर्ज में ही पैदा होता है और कर्ज में ही मर जाता है । उसके बैलों की प्यारी जोड़ी भी उसके हल के साथ बिक जाती है ।

अथक परिश्रम से तैयार की गयी फसल खलिहान तक पहुंचने से पहले साहूकार, जमींदार के हाथों में पहुंच जाती है । उसकी इस आर्थिक अभावग्रस्त पीड़ा की व्यथा-कथा को वही समझ सकता है ।

भारतीय किसान का जीवन तो करुणा का महासागर है । स्वयं अन्न उपजाने के बाद भी उसे तथा उसके परिवार को भरपेट खाने को अन्न नहीं मिलता । किसान के लिए कृषि एक जुआ है । प्रकृति पर निर्भरता उसके जीवन की जटिल समस्या है ।

सिंचाई के साधनों के अभाव में उसे पूरी तरह से मानसून पर निर्भर रहना पड़ता है । अशिक्षा एवं गरीबी के कारण वह कृषि के परम्परागत साधनों को अपनाने के लिए मजबूर हो जाता है ।

आज के वैज्ञानिक युग के अनुरूप वह कृषि को वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार व्यावहारिक रूप से अपनाने में स्वयं को असमर्थ पाता है । सरकारी नीतियां और योजनाएं उसके लिए लाभकारी होते हुए भी प्रभावी सिद्ध नहीं होती हैं । वर्तमान व्यवस्था भी कम दोषपूर्ण नहीं है, जिसमें भ्रष्टाचार का बोलबाला है ।

बिचौलिये और दलाल उसे कहीं का नहीं छोड़ते । सामाजिक रूढ़ियां एवं उसकी स्वयं की संकीर्ण विचारधारा भी उसके सुविधासम्पन्न जीवन के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है । वह कृषि के नये-नये वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग करने में स्वयं को असमर्थ पाता है । शिक्षा एवं गरीबी के कारण उसका स्वारथ्य भी कुप्रभावित हो जाता है, जिसकी वजह से उसकी कार्यक्षमता भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती ।

कृषकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अपनी बहुत-सी नीतियों एवं योजनाओं में भारतीय किसानों को प्राथमिकताएं प्रदान की है । वर्षा पर उसकी निर्भरता को कम करने के लिए सरकार द्वारा विशालकाय तालाब, कुएं, नलकूप एवं नहरों का निर्माण किया गया, जिसके सुचारु संचालन के लिए जो बिजली खपत की जाती है, सरकार उसे अत्यन्त कम दर पर प्रदान करती है ।

कई राज्यों में तो उसे मुपत भी प्रदान करने की सुविधाएं हैं । गांव-गांव में सहकारी भण्डारों एवं समितियों द्वारा उन्हें उतम बीज, उत्तम खाद, कृषि यन्त्र की सरकारी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं । कम ब्याज पर उसे बैंकों से ण प्राप्त करने की विशेष सुविधाएं प्रदान की गयी हैं । गरीब किसानों, भूमिहर किसानों को भूमि भी प्रदान करने की सरकारी योजनाएं उसके हित में हैं ।

सरकारी योजनाओं में किसानों के लिए उनके माल के उचित भण्डारण हेतु व्यवस्थित स्थान दिलाना, उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलाना आदि शामिल हैं । भूमिहीन किसान, जो जमींदारों, साहूकारों के शोषण का शिकार हो रहे हैं, सरकार उन्हें इस प्रकार के शोषण से मुक्त करने हेतु पंचायती राज्य सम्बन्धी योजनाएं बना रही है । उनके शोषण के विरुद्ध कानून बनाये जाने की प्रक्रिया भी निरन्तर चल रही है । उनके रहन-सहन के स्तर को सुधारने हेतु भी कई ग्रामीण योजनाओं की व्यवस्था पंचायती राज में की गयी है ।

3. उपसंहार:

यह बात निःसन्देह रूप से सच है कि भारतीय किसान एक मेहनतकश किसान है । प्रकृति तथा परिस्थितियों की विषमताओं से जूझने की अच्छी क्षमता उसमें विद्यमान है । आधुनिकतम वैज्ञानिक साधनों को अपनाकर वह खेती करने के अनेक तरीके सीख रहा है ।

पहले की तुलना में वह अब अधिक अन्न उत्पादन करने लगा है । शिक्षा के माध्यम से उसमें काफी जागरूकता आ गयी है । वह अपने अधिकारों के प्रति काफी सजग होने लगा है । कुछ परिस्थितियों को छोड़कर अधिकांश स्थितियों में वह कृषि पर आधारित अपनी जीवनशैली में भी बदलाव ला रहा है । उसका परिवार भी अब शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को प्राप्त कर रहा है ।

देश की प्रगति एवं विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहने वाला भारतीय किसान अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार स्तम्भ है । उसकी मेहनतकश जिन्दगी को सारा देश नमन करता है । सच कहा जाये, तो भारतीय किसान एक महान् किसान है, महान् इंसान है ।


4. भारतीयकिसान |Essay on Indian Farmer for College Students in Hindi Language

भारतीय किसान भारतीय की सजीव मूर्ति है । ‘सादा जीवन उच्च-विचार । यह देखो भारतीय किसान’ इस कहावत की सत्यता हमें भारतीय किसान को देखकर सहज ही हो जाती है । ‘भारतीय किसान’ भारतीयता का प्रतिनिधि है । उसमें ही भारत की आत्मा निवास करती है । ऐसा कुछ कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है । सचमुच में भारतीय किसान भारत माँ की प्यारी संतान है ।

भारत माँ की प्यारी संतान भारतीय किसान है; इस कथन के समर्थन में हम यही कहेंगे कि हमारा भारत गाँवों में ही निवास करता है ।इससंदर्भमेंकविवरसुमित्रानंदनपंतकीयहकवितासहजहीयादजातीहै

हैअपनाहिन्दुस्तानकहाँ? यहबसाहमारेगाँवोंमें

सचमुच में हमारा भारत गाँवों में ही बसता है, क्योंकि हमारे देश की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में ही रहती है । जो गाँवों को छोड़कर के शहरों में किसी कारण वस चले जाते हैं, वे भी गाँव की संस्कृति और सभ्यता में ही पले होते हैं ।

भारतीय किसान का जीवन सभ्यता और संस्कृति के इस ऊँचे भवन के नीचे अब फटेहाल और नंगा है । भारतीय किसान का मुख्य धंधा कृषि है । कृषि ही उसकी भक्ति है और कृषि ही उसकी शक्ति है । कृषि ही उसकी निद्रा है और कृषि ही उसका जागरण है । इसलिए भारतीय किसान कृषि के दुःख दर्द और अभाव को बड़े ही साहस और हिम्मत के साथ सहता है । अभाव को बार-बार प्राप्त करने के कारण उसका जीवन ही अभावग्रस्त हो गया है । उसने अपने जीवन को अभाव का सामना करने के लिए पूरी तरह से लगा दिया, फिर भी वह अभावों से मुक्त न हो सका ।

भारतीय किसान अपने जीवन के अभावों से कभी भी मुक्त नहीं हो पाता है । इसके कई करण हैं-सर्वप्रथम उसकी संतुष्टि, अशिक्षा, अज्ञानता आदि है, तो दूसरी ओर आधुनिकता से दूरी, संकीर्णता, कूपमण्डूकता आदि हैं । इस कारण भारतीय किसान आजीवन दुःखी और अभावग्रस्त रहता है ।

वह स्वयं तो अशिक्षित होता ही है अपनी संतान को भी इसी अभिशाप को झेलने के लिए विवश कर देता है । फलत: उसका पूरा परिवार अज्ञानता के भँवर में मँडराता रहता है । भारतीय किसान इसी अज्ञानता और अशिक्षा के कारण संकीर्ण और कृपमण्डूक बना रहता है ।

भाग्यवादी होना भारतीय किसान की जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है । वह कृषि के उत्पादन और उसकी बरवादी को अपनी भाग्य और दुर्भाग्य की रेखा मानकर निराश हो जाता है । वह भाग्य के सहारे अकर्मण्य होकर बैठ जाता है ।

वह कभी भी नहीं सोचता है कि कृषि कर्मक्षेत्र है, जहाँ केवल कर्म ही साथ देता है, भाग्य नहीं । वह तो केवल यही मानकर चलता है कि कृषि-कर्म तो उसने कर दिया है, अब उत्पादन होना न होना तो विधाता के वश की बात है । उसके वश की बात नहीं हैं ।

इसलिए सूखा पड़ने पर, पाला मारने पर या ओले पड़ने पर वह चुपचाप ईश्वराधीन का पाठ पढ़ता है । इसके बाद तत्काल उसे क्या करना चाहिए या इससे पहले किस तरह से बचाव या निगरानी करनी चाहिए थी, इसके विषय में प्राय: भाग्यवादी बनकर वह निश्चिन्त बना रहता है ।

रूढ़िवादिता और परम्परावादी होना भारतीय किसान के स्वभाव की मूल विशेषताएँ हैं । यह शताब्दी से चली आ रही कृषि का उपकरण या यंत्र है । इस को अपनाते रहना उसकी वह रूढ़िवादिता नहीं है । तो और क्या है? इसी अर्थ में भारतीय किसान परम्परावादी, दृष्टिकोण का पोषक और पालक है, जिसे हम देखते ही समझ लेते हैं ।

आधुनिक कृषि के विभिन्न साधनों और आवश्यकताओं को विज्ञान की इस धमा-चौकड़ी प्रधान युग में भी न समझना या अपनाना भारतीय किसान की परम्परावादी दृष्टिकोण का ही प्रमाण है । इस प्रकार भारतीय किसान एक सीमित और परम्परावादी सिद्धान्तों को अपनाने वाला प्राणी है । अंधविश्वासी होना भी भारतीय किसान के चरित्र की एक बहुत बड़ी विशेषता है । अंधविश्वासी होने के कारण भारतीय किसान विभिन्न प्रकार की सामाजिक विषमताओं में उलझा रहता है ।

इस प्रकार भारतीय किसान भाग्यवादी संकीर्ण, परम्परावादी, अज्ञानता, अंधविश्वासी आदि होने के कारण दुःखी और चिन्तित रहता है । फिर भी वह कर्मठ और सत्यता की मूर्ति है । वह मानवता का प्रतीक आत्म-संतुष्ट जीवन यापन करने वाला हमारे समाज का विश्वस्त प्राणी है, जिसे किसी कवि ने संकेत रूप से चित्रित करते हुए कहा है:

बरसारहाहैरविअनल, भूतलतवासाजलरहाहैचलरहा, सनसनपवन, तनसेपसीनाढलरहादेखोकृषकशोणितसुखाकर, हलतथापिचलारहेकिसलोभसेवेइसआंचमेंनिजशरीरजलारहेमध्याह्नउनकीस्त्रियाँलेरोटियाँपहुँचीवहींहैंरोटियाँरुखीसूखी, सागकीचिन्तानहींभरपेटभोजनपागए, तोभाग्यमानोजगगए।। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि भारतीय किसान हमारी भारतीयता की सच्ची मूर्ति है ।


5. भारतीय किसान | Essay on Indian Farmer for College Students in Hindi Language

वर्तमान युग में भारत के कृषक, यानी किसान की स्थिति पहले की तुलना में काफी अच्छी है । पहले की तुलना में आज का भारतीय किसान निरन्तर उन्नति कर रहा है । आज के वैज्ञानिक युग में वैज्ञानिक सुविधाओं का लाभ किसान वर्ग को भी मिला है ।

पहले केवल बड़े जमींदार किसानों का जीवन सुविधा-सम्पन्न हुआ करता था । तब छोटे किसान अभावों में ही जीवन व्यतीत किया करते थे । पहले बुवाई, सिंचाई, कटाई आदि की वैज्ञानिक सुविधाएँ नहीं थी ।

सिंचाई के लिए किसानों को भगवान भरोसे रहकर वर्षा की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी । पहले किसान परिश्रम अधिक करता था और उसे कम फसल प्राप्त होती थी । परन्तु वर्तमान युग में बड़े किसानों के साथ-साथ कम जमीन के मालिक किसान भी फल-फूल रहे हैं । मजदूर किसान की स्थिति अवश्य दुखद है ।

वह आज भी अभावों में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश है ।हमारे देश भारत में समस्त किसानों की स्थिति एक समान नहीं है । हजारों एकड़ जमीन के स्वामी किसान स्वयं तो नाम किसान होते हैं । इनके खेत-खलीहानों में अन्य मजदूर सान काम करते हैं ।

इन बड़े किसानों का खेती में धन व्यय गेता है, परिश्रम मजदूरों का होता है । कम जमीन के स्वामी किसान धन के साथ-साथ अपना परिश्रम भी खेती के लिए खर्च करते हैं । भारत में ऐसे किसानों की संख्या भी कम नहीं है, जिनकी अपनी कृषि-भूमि नहीं है । ऐसे किसान अन्य कृषि-भूमि मालिकों की जमीन पर खेती करते हैं ।

भूमि-मालिक इसके एवज में उनसे नगद धन राशि अथवा आधी फसल लेते हैं । यहाँ ऐसे भी भूमिहीन किसान हैं जो अन्य भूमि-मालिकों की जमीन पर एक निश्चित धनराशि देकर खेती करने में सक्षम नहीं हैं ।

ये मजदूर किसान दूसरों की जमीन पर मजदूरी करके ही जीवन यापन करने का प्रयत्न करते हैं ।

भारत का मजदूर किसान आरम्भ से ही अभावग्रस्त जीवन व्यतीत कर रहा है । दिन-रात खटने के बाद भी वह कठिनाई से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाता है । आधुनिक वैज्ञानिक सुविधाओं से छोटे-बड़े भूमि-मालिक किसानों को लाभ हुआ है, परन्तु भूमि-हीन मजदूर किसान की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है ।

वह मजदूरी के लिए कभी एक भूमि मालिक के खेतों पर जाता है कभी दूसरे के । मजदूरी के लिए उसे दूसरे गाँवों की खाक छानने भी जाना पड़ता हए । ऐसे किसानों के जीवन में कष्ट अधिक हैं । पेट की भूख शान्त करने के लिए ऐसे मजदूर किसानों की पत्नी और बच्चों को भी खेतों पर काम करने जाना पड़ता है ।

परिस्थितियों से घबराकर अनेक मजदूर किसान पलायन करके नगरों महानगरों की ओर भी बढ़ रहे हैं । नगरों, महानगरों में जाकर ये किसान मजदूर मिल-कारखानों आदि में रोजगार तलाश करते हैं । इनके पलायन के कारण गाँवों में मजदूरों का अभाव बढ़ने लगा है ।

भूमि-मालिक किसानों को आवश्यकता पड़ने पर अन्य राज्यों से मजदूर बुलाने पड़ते हैं । वर्तमान में वैज्ञानिक सुविधाओं के कारण भूमि-मालिक किसानों की स्थिति में अवश्य निरन्तर सुधार हो रहा है । किसानों को बिजली, पानी, ट्रैक्टर आदि की सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हो रही हैं ।

उन्हें सस्ती दरों पर सरकार से खेती के लिए ब्याज भी उपलब्ध हो रहा है । आज किसान मनचाहे ढंग से अपनी कृषि-भूमि का उपयोग कर रहा है ।

नगरों के निकट स्थित गाँब के किसान सब्जियों की फसल उगाकर भी लाभ उठा रहे हैं आज का किसान अपनी कृषि-भूमि पर मुर्गी-पालन, मछली-पालन, मधुमक्खी-पालन आदि अधिक लाभ के कार्य भी कर रहा है इसके अतिरिक्त आज का किसान गाय-भैंस की डेयरी के द्वार दूध के व्यवसाय में भी फल-फूल रहा है । आज भारत क किसान भूखा-नंगा नहीं, बल्कि समृद्ध है ।


6. भारत में किसानों की स्थिति ।Essay on the Status of Farmer in India for College Students in Hindi Language

भारत कृषि-प्रधान देश है । यहाँ की अधिकांश जनता गाँवों में रहती है । यह जनता कृषि-कार्य करके अपना ही नहीं, अपने देश का भी भरण-पोषण करती है । भारत में लगभग सात लाख गाँव हैं और इन गाँवों में अधिकांश किसान ही बसते हैं । यही भारत के अन्नदाता हैं ।

यदि भारत को उन्नतिशील और सबल राष्ट्र बनाना है तो पहले किसानों को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाना होगा । किसानों की उपेक्षा करके तथा उन्हें दीनावस्था में रखकर भारत को कभी समृद्ध और ऐश्वर्यशाली नहीं बनाया जा सकता ।

भारतीय किसान साल भर मेहनत करता है, अन्न पैदा करता है तथा देशवासियों को खाद्यान्न प्रदान करता है; किंतु बदले में उसे मिलती है उपेक्षा । वह अन्नदाता होते हुए भी स्वयं भूखा और अधनंगा ही रहता है  ।  वास्तव में, भारतीय किसान दीनता की सजीव प्रतिमा है ।

उसके पैरों में जूते नहीं, शरीर पर कपड़े नहीं, चेहरे पर रौनक नहीं तथा शरीर में शक्ति भी नहीं होती । अधिकांश भारतीय किसान जीवित नर-कंकाल सदृश दिखाई पड़ते हैं । आज का भारतीय किसान संसार के अन्य देशों के किसानों की अपेक्षा बहुत पिछड़ा हुआ है । इसका मूल कारण है: कृषि की अवैज्ञानिक रीति ।

यद्यपि संसार में विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है तथापि हमारे देश का अधिकतर किसान आज भी पारंपरिक हल-बैल लेकर खेती करता है । सिंचाई के साधन भी उसके पास नहीं हैं । उसे अपनी खेती की सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है । तुलनात्मक रूप से वह अन्य देशों के किसानों की अपेक्षा मेहनत भी अधिक करता है, फिर भी अन्न कम ही उत्पन्न कर पाता है ।

यदि भारतीय किसान भी खेती के नए वैज्ञानिक तरीकों को अपना लें तो उन्हें भी कृषि-कार्य में अभूतपूर्व सफलता मिलेगी । इससे वे अपना जीवन-स्तर ऊँचा उठा सकेंगे । भारतीय किसान की हीनावस्था का दूसरा कारण है: अशिक्षा ।

अशिक्षा के कारण ही भारतीय किसान सामाजिक कुरीतियों, कुसंस्कारों में बुरी तरह जकड़े हुए हैं और पुरानी रूढ़ियों को तोड़ना पाप समझते हैं । फलस्वरूप शादी-विवाह, जन्म-मरण के अवसर पर भी झूठी मान-प्रतिष्ठा और लोक-लज्जा के कारण उधार लेकर भी भोज आदि पर खूब खर्च करते हैं और सदैव कर्ज में डूबे रहते हैं । अंतत: कर्ज में ही मर जाते हैं ।

यही उनका वास्तविक जीवन है और नियति भी । भारतीय किसान खेती के अतिरिक्त अन्य उद्योग-धंधे नहीं अपनाते । फलस्वरूप खाली समय को वे व्यर्थ ही व्यतीत कर देते हैं । इससे भी उन्हें आर्थिक हानि होती है । सरकार को यदि किसानों के जीवन में सुधार लाना है तो सर्वप्रथम उन्हें शिक्षित करना चाहिए ।

गाँव-गाँव में शिक्षा का प्रसार करके अविद्या का नाश करना चाहिए । किसानों की शिक्षा के लिए रात्रि-पाठशालाएँ तथा प्रौढ़-पाठशालाएं खोलनी चाहिए, जहाँ कृषि-कार्य से छुट्‌टी पाकर कृषक विद्या प्राप्त कर सकें । शिक्षा के द्वारा ही किसान समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने में सक्षम हो सकते हैं । किसानों को कृषि के वैज्ञानिक तरीकों से परिचित कराना चाहिए ।

उन्हें उचित मूल्य पर नए ढंग के औजार तथा बीज एवं खाद आदि उपलब्ध कराए जाने चाहिए । किसानों के लिए सिंचाई के साधन भी जुटाने की चेष्टा करनी चाहिए, जिससे वे केवल वर्षा पर ही निर्भर न रहें । गाँव-गाँव में सरकारी समितियाँ खुलनी चाहिए, जो किसानों को अच्छे बीज तथा उचित ऋण देकर उन्हें सूदखोरों से बचाएँ ।

भारतीय किसान के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । किसानों को कपड़ा बुनने, रस्सी बनाने, टोकरी बनाने, पशु-पालन तथा अन्य उद्योग- धंधों की शिक्षा मिलनी चाहिए, जिससे वे अपने खाली समय का सदुपयोग करके अपनी आर्थिक उन्नति कर सकें ।